बंसीलाल आज भी अंधा है..

देश आज राजनीति में ‘मन की बात’ के दौर से गुजर रहा है| मष्तिष्क मनुष्य के विवेक का संरक्षक है| मनुष्य का विवेक सत्य-असत्य, भले-बुरे, सुख-पीड़ा के भेद को जानकर मनुष्य के मन पर नियंत्रण रखता है| विवेक अपने-पराये से उपर उठकर सोचने की सक्षमता देता है| पर, जब बातें मन की होती हैं तो विवेक के नियंत्रण से मुक्त होती हैं|

बंसीलाल आज भी अंधा है और गंगाराम आज भी लंगड़ा| आप सोचेंगे कि यह अचानक बंसीलाल और गंगाराम कहाँ से आ गए? दरअसल ये कहीं से आये नहीं हैं, मेरे अन्दर ही थे स्मृतियों में| आज प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अचानक उस स्मृति को कुरेद कर ताजा कर दिया| कल उत्सव धर्मी प्रदेश छत्तीसगढ़ में एक और उत्सव राज्य स्तरीय शाला प्रवेश उत्सव मनाया गया| पिछले कुछ वर्षों से यह एक नया उत्सव है, जो प्रदेश में मनाया जाता है| यह उत्सव पूरे प्रदेश में 16 जून से लेकर 30 जून तक चलेगा| कल रायपुर में, माना बस्ती में आयोजित ‘राज्य स्तरीय शाला प्रवेश उत्सव’ का शुभारंभ करते हुए प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अपने पहले स्कूली दिन को कुछ इस तरह याद किया;

 

“स्कूल का पहला दिन 63 साल बाद भी याद है| मैं उस नेत्रहीन व्यक्ति जिसका नाम गुडनाईट था, को कभी नहीं भूलूंगा, जब पहली बार उनके कंधे पर बैठकर स्कूल गया| वे छुट्टी होने तक स्कूल के बाहर बैठे रहते थे| उनके हाथ में एक छड़ी होती थी| कभी स्कूल जाने के लिए आनाकानी करता तो वे छड़ी दिखाकर डराते किन्तु जब वह छड़ी मेरे हाथ लगती तो मैं भी बड़ों की तरह डांटता|”

 

उनके भाषण के इस हिस्से पर किसी भी तरह का कमेन्ट करने के बजाय मैं केवल अपने पाठकों से यह भर कहना चाहूंगा कि रमन सिंह 7 दिसम्बर 2003 से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं और नेट तथा अन्यत्र बिखरी पड़ी जानकारियों के अनुसार उनका जन्म 15 अक्टूबर, 1952 को हुआ था। उनकी स्कूली शिक्षा छुईखदान, कवर्धा और राजनांदगांव में हुई एवं उनके पिता कवर्धा के एक सफल और सदाशयी एडवोकेट थे| और, जिस दिन वे भाषण दे रहे थे, 16 जून, 2015 को उनकी आयु 62वर्ष, 8माह, 1दिन थी| जिन दिनों वे स्कूल में भर्ती हुए होंगे, नर्सरी, केजी-1, केजी-2 का रिवाज नहीं था| सामान्यत: बच्चे पांच वर्ष की आयु में माँ-पिता अथवा किसी अन्य के द्वारा स्कूल ले जाए जाते थे| पर, पैदा होने के तुरंत बाद स्कूल में भरती करने का कोई रिवाज तो कतई नहीं था| पैदा होने के बाद तुरंत स्कूल में भरती किये जाने का कोई उदाहरण पौराणिक ग्रन्थों में है या नहीं, मुझे नहीं मालूम| बहरहाल, इस बात को मैं यहीं छोड़ता हूँ, क्योंकि मुझे तो आपको बंसीलाल के बारे में बताना है, जो आज भी अंधा है और गंगाराम, जो आज भी लंगड़ा है| इनकी याद मेरी स्मृति में मुख्यमंत्री के भाषण के उपर उद्धृत अंश से आई|

 

जब मैं लगभग 56-57 में पहली अथवा दूसरी कक्षा में था तो हिन्दी की किताब में एक पाठ था| पाठ कुछ इस तरह था;

 

“बंसीलाल अंधा था| गंगाराम लंगड़ा था| दोनों मेले जाना चाहते थे| बंसीलाल ने गंगाराम को कंधे पर बिठाल लिया| गंगाराम रास्ता बताता जाता था और बंसीलाल चलता जाता था| इस तरह दोनों मेले पहुँच गए|” (पंक्तियाँ स्मृति के आधार पर)

 

मुझे याद नहीं कि मेरे शिक्षक ने उपरोक्त कहानी से क्या शिक्षा मिलती है बताया था? मुझे स्कूल जाने का पहला दिन भी याद नहीं है| पर, एक सवाल मुझे हमेशा परेशान करता रहा| मेले का सारा आनंद तो दृश्यों में है| गंगाराम देखकर मेले का आनंद ले सकता है| पर, वो चल नहीं सकता| बंसीलाल अंधा था, वह देखकर मेले का आनंद नहीं ले सकता था| फिर, बंसीलाल गंगाराम को कंधे पर बिठालकर मेले क्यों ले गया? जरुर गंगाराम ने बंसीलाल के मन में मेले के लिए लालच जगाया होगा, ताकि वो गंगाराम को अपने कंधे पर बिठा कर ले जाए| यहाँ बंसीलाल कर्म का प्रतीक है| वो कामगार है| गंगाराम योजनाकार है| वह अपनी बातों से बंसीलाल को बहला/फुसला सकता है|

 

जीवन में आती हुई परिपक्वता के साथ धीरे-धीरे कहानी के और भी अर्थ खुलने लगे| हम सब जो मेहनत करके अपनी रोजी रोटी कमाते हैं, मजदूर/किसान/कर्मचारी बंसीलाल ही हैं| आँखों वाले बंसीलाल, जिन्हें गंगाराम, राजनेता/उद्योगपति/नौकरशाह हर पांच साल में ही क्यों, हरदम बहलाते/फुसलाते रहते हैं| हम सब देखते और जानते हुए भी उनके बहलाने/फुसलाने में आ जाते हैं| वह डराते भी हैं, उनकी सत्ता की छड़ी से, जो हम उनके हाथों में हर 5 साल में दे देते हैं| गंगाराम आज भी कुछ नहीं करता, सिवाय हमारी पीठ पर सवारी के मगर हमारी पैदा की हुई दौलत पर उसका अधिकार है| वह कुछ नहीं बनाता पर हमारी बनाई हुई खूबसूरत दुनिया पर उसका अधिकार है| गंगाराम के सारे फायदे/ऐश/आराम बंसीलाल के अंधे बने रहने में हैं| गंगाराम बंसीलाल को अंधा बनाए रखने के लिए सारे जतन करता रहता है|

 

देश आज राजनीति में ‘मन की बात’ के दौर से गुजर रहा है| मष्तिष्क मनुष्य के विवेक का संरक्षक है| मनुष्य का विवेक सत्य-असत्य, भले-बुरे, सुख-पीड़ा के भेद को जानकर मनुष्य के मन पर नियंत्रण रखता है| विवेक अपने-पराये से उपर उठकर सोचने की सक्षमता देता है| पर, जब बातें मन की होती हैं तो विवेक के नियंत्रण से मुक्त होती हैं| तब यह सुधि नहीं रहती कि उसी उत्सव के दिन उसी राज्य शासन के शिक्षा विभाग ने 2918 स्कूलों को ‘युक्तियुक्तकरण’ योजना के तहत बंद करने का आदेश निकाला है| इन बंद होने वाले स्कूलों के हजारों बच्चे कहाँ जायेंगे? आगे पढ़ेंगे भी या नहीं? उत्सवधर्मी मन को इन सभी बातों से कोई मतलब नहीं| तब यह याद नहीं आता कि प्रदेश के लगभग 17000 स्कूलों में शौचालय नहीं है| 8164 स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं हैं| स्कूल शिक्षा सुविधाओं में राष्ट्रीय स्तर पर हमारा स्थान 27वां है| आधे से अधिक स्कूलों में खेल के मैदान, बाऊंड्रीवाल और करीब करीब 90% स्कूलों में कम्प्यूटरीकृत सुविधाएं नहीं हैं| क्यों प्रायमरी स्कूल में दाखिला लेने वाले प्रत्येक दस बच्चों में से बमुश्किल 2 बच्चे हायर सेकेंडरी तक पहुँचते हैं|  क्यों स्कूलों में व्याख्याताओं, प्राचार्यों तथा प्रधान पाठकों के हजारों पद रिक्त हैं| यह सब मष्तिष्क की बाते हैं| मन तो उत्सवधर्मी है| गंगाराम को तो बस बंसीलाल के कंधे पर चढ़कर मेले पहुंचना है| बंसीलाल उत्सव के आँखों देखे हाल से संतुष्ट हो जाता है, यह वह जानता है|     

 

आज से 63 वर्ष पूर्व गुडनाईट ‘रात्री संबोधन’ के रूप में तक प्रचलित नहीं था| ‘गुडनाईट’ नाम मैंने पहली बार सुना है| 20-25 हजार की आबादी वाले कस्बों में भी मुश्किल से 10-20 मेट्रिक पास मिलते थे| गुडनाईट का दिन भर स्कूल के सामने बैठे रहना, उस समय व्याप्त सामंती शोषण का प्रतीक है| वैसे, गुडनाईट के बारे में तो नहीं मालूम, हाँ बंसीलाल, मुख्यमंत्री के संबोधन से जिसकी याद आई, आज भी अंधा है और गंगाराम आज भी उसके कंधे पर सवार|

 

अरुण कान्त शुक्ला

18/6/2015                 

सिर्फ ग्रेकस बदलता है नीति नहीं..

2014 के 16वीं लोकसभा के गठन के लिए हुए आम चुनाव से इस मामले में भिन्न हैं की भारत में पहली बार किसी राजनीतिक दल ने उजागर और घोषित रूप से पूंजीपतियों के लिए, पूंजीपतियों की मदद से चुनाव लड़ा और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में उस भ्रमजाल को फैलाने में कामयाब हुआ, जो हमें हावर्ड फ़ास्ट की महाकथा ‘स्पार्टकस’ के ग्रेकस की याद दिलाता है|

 

प्रत्येक लोकसभा चुनाव के पश्चात गठित नई सरकार के पहले 100 दिनों और पहले एक वर्ष के कार्यों का लेखा जोखा लेने की परंपरा नई हो या पुरानी, इसका औचित्य या तो बहुत कम है या बिलकुल ही नहीं है| इसका पहला कारण तो यह है कि नई सरकार के लिए अपनी नीतियों को लागू करके उनके परिणामों को प्राप्त करने के लिए 100 दिन या एक वर्ष का समय कार्यों के मूल्यांकन के लिए बहुत कम होता है| फिर 100 दिनों या पहले एक वर्ष के कार्यों के परिणामों का लेखा-जोखा तब लिया जाना चाहिए, जब सरकारों के बदलने के साथ साथ उनकी नीतियों में भी कोई बुनियादी परिवर्तन का आश्वासन नई सरकार या नई पार्टी की सरकार ने जनता के सामने रखा हो|  

 

दूसरी बात, यदि हम अमेरिका या ब्रिटेन से हमारे देश की राजनीतिक स्थिति का मिलान (तुलना) करें तो एक अद्भुत साम्य से हमारा सामना होता है| आधुनिक अमरीकन राजनीतिक ताने-बाने में दो राजनीतिक दलों के मध्य ही सत्ता की अदली बदली होती रहती है| एक तरफ रिपब्लिकन पार्टी है, जिसे अमेरिकन कंजर्वेटिव पार्टी भी कह सकते हैं, जो राजनीति में शास्त्रीय स्वतंत्रता का अनुशरण करती है| याने निजी संपत्ति की विचारधारा का समर्थन, बिना रोक-टोक की बाजार अर्थव्यवस्था की पक्षधरता, क़ानून का शासन, न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप, धर्म-पालन, प्रेस की आजादी और मुक्त व्यापार आधारित विश्व शान्ति| दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी है, जो राजनीति और अर्थशास्त्र में आधुनिक स्वतंत्रता की पक्षधर है| याने मिश्रित अर्थव्यवस्था के तहत एक लोक-कल्याणकारी राज्य और प्रगति का सामाजिक रूप या ढंग| शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं की सुरक्षा, रोजगार के अधिकार इसी के तहत आते हैं|

 

कमोबेश, यही हमें ब्रिटेन में कंजर्वेटिव और लेबर पार्टी के रूप में दिखाई पड़ता है| लेबर पार्टी, जो संगठित ट्रेड युनियनों, श्रम-आन्दोलनों और राजनीति में समाजवादी विचारधारा के साथ साम्य बिठाने की बात करती है और कंजर्वेटिव पार्टी, जिसका झुकाव और रुझान राजनीति में वर्तमान स्थिति को यथावत रखने या रुढ़िवादी व्यवस्था को बढ़ाने और बनाए रखने की तरफ होता है| कंजर्वेटिव राजनीतिक दर्शन परंपरागत संस्थाओं और रूढ़िवादिताओं को सम्मानित करने के लिए जोर देता है| कंजरवेटिव सभी तरह के सामाजिक सुधार या समाज के उन्नयन के लिए सार्वजनिक धन के उपयोग या विधी जन्य उपायों के खिलाफ होते हैं| राजनीतिक पंडित यूके में लेबर पार्टी को और अमेरिका में डेमोक्रेटस को वाम राजनीति के ज्यादा नजदीक मानते हैं| विशेष बात यह है की दोनों देशों की दोनों पार्टियां पूँजीपरस्त राजनीति की ही अनुगामी हैं| उनकी राजनीतिक और सामाजिक नीतियों में अंतर शास्त्रीय स्वतंत्रता और आधुनिक स्वतंत्रता के मध्य का ही अंतर है|

 

बिना इन राजनीतिक पार्टियों के इतिहास में जाए, इसमें एक रोचक तथ्य और जोड़ा जा सकता है| आज पूरी दुनिया में जिन भूमंडलीकरण, निजीकरण और मुक्त व्यापार की नवउदारवादी नीतियों के नाम पर हाहाकार मचा हुआ है, 1981 में उनकी दुनिया में शुरुवात करने वाले अमेरिकी प्रेसिडेंट रीगन (81-89) और यूनाईटेड किंगडम (ब्रिटेन) की प्रधानमंत्री मार्गेट थेचर (1979-1990) क्रमश: रिपब्लिकन और कंजर्वेटिव पार्टी के ही थे| यह वही दोनों थे जिन्होंने पूरी विश्व की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को, विशेषकर विकासशील और अविकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं को विश्व बैंक, आईएमएफ और गाट (आज का विश्व व्यापार संगठन) की मदद से बदलकर रख दिया| उनके राजनीतिक दर्शन और आर्थिक नीतियों का ही प्रभाव था कि पूरे विश्व में विनियंत्रित वित्तीय क्षेत्र, श्रम कानूनों से मुक्त श्रम बाजार, राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियों के निजीकरण और ट्रेड यूनियनों के प्रभाव को निष्क्रिय करने का दौर 1981 में शुरू हुआ और आज तक चला आ रहा है| यही कारण है कि उदारवाद-भूमंडलीकरण-निजीकरण की इन नीतियों को रीगनवाद और थेचरवाद के नाम से भी जाना जाता है| अब इसमें दूसरा रोचक तथ्य यह जोड़ा जा सकता है कि एक बार (प्रचलित नाम) एलपीजी की नीतियों के लागू हो जाने के बाद चाहे वह अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में आई हो या ब्रिटेन में लेबर पार्टी, सभी को उन्हीं थेचरी और रीगनी नीतियों पर ही चलना पड़ा| यदि कोई अंतर आया तो वह समाज के गरीब तबकों और असंगठित मजदूरों के लिए चलाई गईं कुछ कल्याणकारी योजनाओं और शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में किये गए श्रंगारिक कार्यों तक ही सीमित रहा, जिसका कोई भी ठोस प्रतिफलन उन तबकों के जीवनस्तर में भी सुधार के रूप में दिखाई नहीं पड़ा|

 

अब यदि उपरोक्त परिदृश्य में भारत में 2014 में हुए राजनीतिक परिवर्तन आकें तो हमें देश की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में किसी भी मूलगामी परिवर्तन का संकेत नहीं मिलता है| सिवाय इसके कि लगभग ढाई दशक पहले नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहनसिंह ने एलपीजी के जिस रास्ते पर देश को डाला था, उस रास्ते पर मोदी सरकार और भी तेजी और कट्टरता के साथ बढ़ रही है| रीगन और थेचर के देश से साम्यता खोजें तो भारत में भाजपा रिपब्लिकन और कंजर्वेटिव है, अपने साम्प्रदायिक एजेंडे के साथ|

 

2014 के लोकसभा के चुनावों के दौरान हमारे सामने दो अहं सच्चाईयां थीं| पहली, यूपीए सरकार के द्वारा जनता के अपेक्षाकृत कमजोर हिस्से के लिए लाई गईं मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार, जैसी तमाम योजनाओं के बावजूद उजागर हुए कोयला, कामनवेल्थ, 2जी और अन्य घोटालों ने साधारण से साधारण देशवासी को भी मानसिक रूप से त्रस्त कर दिया था और उन्हें किसी भी कीमत पर कांग्रेसनीत सरकार से छुटकारा पाना ही एकमात्र उपाय लगा था| यह फिलवक्त सच है कि इस एक वर्ष के दौरान केंद्र के स्तर पर कोई भी बड़ा स्केम सामने नहीं आया है| पर, यह तो यूपीए के साथ भी था| याद कीजिये यूपीए-1 के पहले या दूसरे वर्ष में कोई बड़ा स्केम नहीं था, मगर अन्दर ही अन्दर घोटालों की तैय्यारियाँ चालू थीं| फिर यदि क़ानून के द्वारा ही अवैधानिक कार्यों को वैध बना दिया जाए तो स्केमों की संख्या तो वैसे ही कम हो जाती है| यदि हम इस एक वर्ष के दौरान भाजपानीत एनडीए (मोदी) सरकार के द्वारा जारी किये गए अध्यादेशों या लोकसभा में पास हुए कानूनों का गहराई से अध्यन करें तो पायेंगे कि करीब- करीब सभी या तो अवैधानिकता का नियमतिकरण (वैधानिक जामा पहनाना) करते हैं या देश के प्राकृतिक संसाधनों और देश की श्रम शक्ति तथा लोगों की खून-पसीने की कमाई से की गईं बचतों की लूट में आ रही बाधाओं दूर करने के लिए लाए/बनाए गए हैं| इंश्योरेंस बिल(2015), कोयला खदान(विशेष प्रावधान) 2015, खदान और खनिज (विकास एवं नियंत्रण) संशोधन बिल 2015, भू अधिग्रहण उचित मुआवजा/ पारदर्शिता, पुनर्व्यवस्थापन एवं स्थानान्तारण (संशोधन) बिल 2015, लघु कारखाना(रोजगार एवं अन्य दशाएं नियंत्रण) क़ानून 2014, राष्ट्रीय कामगार वोकेशनल संस्थान क़ानून 2015, और श्रम संबंधित अन्य कानूनों का भी उद्देश्य देश के संसाधनों को लुटाना, श्रम कानूनों से कारखानेदारों को मुक्ति दिलाकर श्रम के शोषण के रास्ते की बाधाओं को हटाना ही है| इन सभी कानूनों के पूर्व के रहते हुए कार्पोरेट्स-राजनेता-अफसरशाही के पास घोटाले करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं था| अब सभी अवैधानिकता को वैधानिकता का जामा पहनाया जा रहा है|      

 

दूसरी कि, भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के लिए नामांकित नरेंद्र मोदी ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस शासन की खामियों और बुराईयों को उजागर करने के अलावा अपनी या अपनी पार्टी की तरफ से कोई भी ठोस वायदा देश के लोगों के साथ नहीं किया| भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मोदी दोनों स्वीकार कर चुके हैं कि ‘अच्छे दिन आयेंगे’ या ‘100 दिनों में काला धन वापस आ जाएगा’ राजनीतिक जुमलेबाजी थी| इतना ही नहीं, चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी सेना के सेवानिवृत अधिकारियों और जवानों के बीच गए थे और वायदा करके आये थे कि शासन में आते ही ‘वन रेंक वन पेंशन’ लागू कर देंगे| अब वह मन की बात में कह रहे हैं कि उन्होंने इस कार्य को जितना सरल समझा था यह उतना सरल नहीं है| स्वतन्त्र भारत में अभी तक हुए सभी आम चुनाव, 2014 के 16वीं लोकसभा के गठन के लिए हुए आम चुनाव से इस मामले में भिन्न हैं की भारत में पहली बार किसी राजनीतिक दल ने उजागर और घोषित रूप से पूंजीपतियों के लिए, पूंजीपतियों की मदद से चुनाव लड़ा और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में उस भ्रमजाल को फैलाने में कामयाब हुआ, जो हमें हावर्ड फ़ास्ट की महाकथा ‘स्पार्टकस’ के ग्रेकस की याद दिलाता है|

 

स्पार्टकस में ग्रेकस राजनीतिज्ञ है, जो रोम की सीनेट का सदस्य है| “स्पार्टकस” में ईसा से 73 वर्ष पूर्व के रोम की कथा है जब गुलामी की प्रथा अपने चरम पर थी और उन्ही गुलामों में से एक “स्पार्टकस” ने उस पाशविक प्रथा को चुनौती देने का विवेक और साहस अपने आप में पाया था| मैं नीचे एक उद्धरण देने के बाद गणतंत्र, पूंजीपति, राजनीतिज्ञ, आम लोगों के बारे में ग्रेकस के विचार क्या थे, उन्हें जैसा का तैसा दे रहा हूँ| आपको ऐसा प्रतीत होगा मानो ग्रेकस इस देश के बारे में ही बोल रहा है…    

 

“घर और परिवार और इज्जत और शराफत और नेकी और जो कुछ भी अच्छा था और पवित्र था उसके मालिक गुलाम थे और वही उसकी रक्षा कर रहे थे – इसलिए नहीं कि वे अच्छे और पवित्र थे बल्कि इसलिए कि जो कुछ भी पवित्र था सब उसके मालिकों ने उन्ही गुलामों के हवाले कर दिया था|”                                                                    (ग्रेकस का कथन गुलामों के बारे में)

 

ग्रेकस के उपरोक्त विश्लेषण का अर्थ कदापि यह नहीं लगाया जा सकता कि कि उसे विद्रोही गुलामों से कोई सुहानुभूति थी या फिर वह उस व्यवस्था को बदलना चाहता था| स्वयं ग्रेकस के अनुसार राजनीतिज्ञ चालबाज होता है और राजनीतिज्ञ के अंदर इस चीज (चालबाजी) को देखकर लोग अकसर इसको ईमानदारी समझने की भूल किया करते हैं| ग्रेकस की गणतंत्र के बारे में राय देखिये;

 

“देखो हम लोग एक गणतंत्र में रहते हैं | इसका मतलब है कि बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास कुछ भी नहीं है और मुठ्ठी भर लोग ऐसे हैं जिनके पास बहुत कुछ है| और जिनके पास बहुत कुछ है उनकी रक्षा, उनका बचाव उन्हीं को करना है जिनके पास कुछ भी नहीं |”

 

ग्रेकस के अनुसार इस तरह के गणतंत्र को बनाए रखने के लिये सीमेंट का काम राजनीतिज्ञ ही करते हैं| उच्चवंश (सम्पतिवान) इस काम को नहीं कर सकते क्योंकि उनकी निगाह में जनता भेड़ बकरी के सामान होती है| उच्चवंशीय को साधारण नागरिक के बारे में कुछ नहीं मालूम| अगर यह सब उसके भरोसे छोड़ दिया जाए तो समूचा ढांचा एक दिन में भहरा पड़े| इसे बचाने का काम राजनीतिज्ञ करते हैं| कैसे करते हैं, ग्रेकस से सुनिए;

 

“ ………… जो चीज नितांत असंगत है हम उसके अंदर संगती पैदा करते हैं| हम लोगों को यह समझा देते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता अमीरों के लिये मरने में है| हम अमीरों को यह समझा देते हैं कि उन्हें अपनी दौलत का कुछ हिस्सा छोड़ देना चाहिए ताकि बाकी को वे अपने पास रख सकें| हम जादूगर हैं| हम भ्रम की चादर फैला देते हैं और वह ऐसा भ्रम होता है जिससे कोई बच नहीं सकता| हम लोगों से कहते हैं–तुम्हीं शक्ति हो| तुम्हारा वोट ही रोम की शक्ति और कीर्ति का स्त्रोत है| सारे संसार में केवल तुम्हीं स्वतन्त्र हो| तुम्हारी स्वतंत्रता से बढ़कर मूल्यवान कोई भी चीज नहीं है, तुम्हारी सभ्यता से बढ़कर मूल्यवान कोई भी चीज नहीं है, तुम्हारी सभ्यता से अधिक प्रशंसनीय कुछ भी नहीं है| और तुम्ही उसको नियंत्रित करते हो; तुम्हीं शक्ति हो, तुम्ही सत्ता हो| और तब वे हमारे उम्मीदवार के लिये वोट दे देते हैं| वे हमारी हार पर आँसू बहाते हैं, हमारी जीत पर खुशी से हँसते हैं| …………….चाहे उनकी हालत कितनी भी गिरी क्यों न हो, चाहे वे नालियों में ही क्यों न सोते हों, ………….. चाहे वे अपने बच्चों के पैदा होते ही उनका गला क्यों न घोंट देते हों, चाहे उनकी बसर खैरात पर ही क्यों न होती हो और चाहे पैदाईश से लेकर मरने तक उन्होंने एक रोज काम करने के लिये हाथ न उठाया हो, ………. यह मेरी कला है| राजनीति को कभी तुच्छ नहीं समझना|”

 

यही आवाज तो आज हम सुन रहे हैं !

 

अरुण कान्त शुक्ला,                                                           जून15, 2015

 

 

 

अच्छा हुआ, अरुणा शानबाग, तुम मर गईं…

अच्छा हुआ अरुणा शानबाग तुम मर गईं! तुम 42 साल तक कोमा में रहीं| शरीर के हिसाब से यह एक दर्दनाक स्थिति है| जंजीरों से बांधकर किये गए क्रूर बलात्कार के बाद 42 साल तक ज़िंदा मृत के सामान पड़े रहना, यह वह जिन्दगी है जो बुद्ध, विवेकानंद, गांधी के देश के लोगों ने तुन्हें दी| मैं ईश्वर जैसी किसी सत्ता को नहीं मानता| पर, ईश्वर नाम की उस शख्सियत से डरता बहुत हूँ| क्यों डरता हूँ, क्योंकि इस देश में उसी के नाम से शासन चलाया जाता है| क्यों डरता हूँ, क्योंकि हर बलात्कार के बाद यही कहा जाता है कि ईश्वर की यही मर्जी थी| क्यों डरता हूँ, क्योंकि उसकी और उसके अनुयायियों की अनुकंपनाएं सीधे-सच्चे-सहृदय लोगों पर नहीं बरसतीं| सीधे-सच्चे-सहृदय लोगों के लिए उसके पास सिर्फ सजाएं हैं, क्रूरता है| किसी दिन मिला तो उससे पूछूंगा कि सीधे-सच्चे-सहृदय लोगों को ही उसकी सजाएं क्यों रोज भुगतनी पड़ती हैं?ये सजायें, जो रोजमर्रा के अमानवीय अपमानों से शुरू होती हैं और भूख के बाजार से होता हुई जिस्म की मौत पर खत्म होती हैं|

मुझे नहीं मालूम, अभी तक विज्ञान इसका पता कर पाया है कि नहीं कि जो व्यक्ति कोमा में रहता है वह सोच सकता है या नहीं? वह सुन सकता है या नहीं? पर, मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ, शायद सुन सकता होगा! पर सोच तो कतई नहीं सकता होगा| मेरे इस विशवास का कारण है| मेरा यह देश पिछले 68 वर्ष से, 15 अगस्त, 1947 से कोमा में है| तुम 42 साल लगातार कोमा में रहीं, तुम्हारे साथ बलात्कार हुआ था| तुमने प्रतिवाद भी किया होगा| तुम्हें चोट लगी थी| तुम सहन नहीं कर पाईं| देशवासी किसी भी देश का शरीर होते हैं| इस देश के लोगों के साथ भी 200 वर्षों तक बलात्कार हुआ| हमने संघर्ष भी किया| हमारे पुरुखों ने अपनी जानें कुर्बान कीं| घायल हुए| पर, कोमा में नहीं गए| आजादी हासिल किये| पर, उसके बाद हमारे हुक्मरानों ने हमें कोमा में भेज दिया| तुम घायल होकर कोमा में गईं| हम होश-ओ-हवास में कोमा में भेजे गए| लोकतंत्र के कोमा में| हमारे अपने स्वराज के कोमा में| हमें हर पांच साल में चुनावी ग्लूकोज की बाटल चढ़ाई जाती है| उस बाटल में आश्वासन का इंजेक्शन लगाया जाता है| मोहक सपनों के वेंटीलेटर पर हमें ज़िंदा रखा जाता है| हम एक ऐसे कोमा में हैं जिसमें देख सकते हैं पर कुछ कर नहीं सकते| सुन सकते हैं पर सोच नहीं सकते| हमें मूर्ख बनाया जा रहा है, जान सकते हैं पर समझ नहीं सकते| मोहक सपनों का वेंटीलेटर हमें ज़िंदा रहने के भ्रम का अहसास कराता है| हम स्वयं को सुरक्षित समझते हैं, पर हैं नहीं| तुम भी इसी कोमा में थीं| तुम्हें लगता था, इतना बड़ा अस्पताल, सहकर्मी, तुम सुरक्षित हो, पर तुम दूसरे कोमा में चली गईं|

इस दूसरे कोमा में जाने वाली तुम अकेली नहीं हो| निर्भया भी गयी है| प्रति मिनिट एक लड़की जाती है| हर घंटे एक किसान जाता है| हर घंटे एक मजदूर जाता है| और सभी मर जाते हैं| जो मरते नहीं हैं, वे मोहक सपनों और आश्वासनों के कोमा में मृतप्राय पड़े रहते हैं| इसीलिये उन्हें तुम्हारे मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता| इसलिए कि जो कोमा में हैं, उन्हें किसी भी चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता|

अरुण कांत शुक्ला,                                                     18/5/2015          

 

गणतंत्र दिवस पर ही संविधान को मारी टंगड़ी ..

गणतंत्र दिवस पर ही संविधान को मारी टंगड़ी ..
केंद्र सरकार ने सूचना प्रसारण मंत्रालय के ऐड में से सोशलिस्ट- सेक्युलर शब्द गायब करवाये ..

आपको क्या लग रहा था ..महात्मा गांधी के जन्मदिन, बड़े दिन, नव-वर्ष, नेहरू के जन्मदिन, शिक्षक दिवस सभी के साथ छेड़छाड़ करने वाला शख्स संविधान दिवस को अपनी हरकतों से बाज आयेगा..

यदि कोई ऐसा सोच रहा था..तो वह अपनी सोच को सुधारने के लिए उस स्वर्ग में जाए जो उस व्यक्ति ने ऐसे लोगों के लिए ख्यालों, हवाओं और लफ्फाजियों में बनाकर रखा है..

उसने तो गणतंत्र दिवस पर गणतंत्र के मूलाधार संविधान में ही तोड़-फोड़ करके रख दी..

ये है भारत सरकार का 26 जनवरी को निकाला गया विज्ञापन नंबर DAVP22201/13/0048/1415, इसमें सरकार की ओर से लिखी गयी प्रस्तावना में अंगरेजी में लिखा गया है “We the people of India, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN DEMOCRATIC REPUBLIC….”

जबकि संविधान में लिखी असली पंक्तियाँ हैं..

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens…”

भारत सरकार के सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने विज्ञापन में संविधान की प्रस्तावना से सोशलिस्ट और सेक्युलर शब्द ही उड़ा दिए..

जिस लोकतंत्र पर ये गर्व करते हैं..
जिसका हवाला देकर ये कहते हैं कि इसकी ताकत से ही एक चायवाला भी देश का प्रधानमंत्री बन सका..
जिसका हवाला अभी अभी एक रसोईये का पोता और दुनिया के सबसे पुराने और मजबूत लोकतंत्र का राष्ट्रपति देकर गया..
उसे पता ही नहीं होगा कि..
उसी संविधान को उसी दिन, जब वह परेड देख रहा था, गणतंत्र के दिन ठोकर मारी जा चुकी है..

कोई यदि यह सोचता है कि यह गलती सिर्फ प्रशासनिक स्तर की है या कुछ चम्मच अधिकारियों के अति-चम्मच होने की है और ऐसा जान-बूझकर, सोच-समझकर नहीं करवाया गया है या इस देश के प्रधानमंत्री को यह नहीं मालूम होगा तो मैं पुन: कहता हूँ कि उन्हें उसी स्वर्ग में जाना चाहिए जो उस व्यक्ति ने ऐसे लोगों के लिए ख्यालों, हवाओं और लफ्फाजियों में बनाकर रखा है..

एक माह में 10 अध्यादेश..
बिना संविधान में संशोधन के संविधान के प्रिएम्बल में परिवर्तन..
इनके हाथों में लोकतंत्र और लोक का भविष्य..?
ये दोनों शब्द 44वें संविधान संशोधन के बाद प्रस्तावना में जोड़े गए थे। और यह आकस्मिक नहीं हो सकता है क्योंकि संविधान का दिन मनाने के दिन ही यह घटना हुई है। यह आकस्मिक नहीं है क्योंकि नरेंद्र मोदी खुद अपने भाषणों में सेक्युलर शब्द का मजाक उड़ाते रहे हैं।

इस संबंध में अब केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन राठौर का कहना है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि सरकार पहली प्रस्तावना का सम्मान कर रही है। राठौर ने कहा, ‘कुछ लोग इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि सेक्युलर और सोशलिस्ट दो शब्द गायब हैं। ये शब्द तो 1976 में जोड़े गए। हम पहली प्रस्तावना का सम्मान कर रहे हैं इसलिए वह तस्वीर इस्तेमाल की गई।’
इसका अर्थ हुआ कि सरकार अभी जो भू-सुधार अध्यादेश लेकर आई है, उसका कोई अर्थ नहीं है या जितने भी अध्यादेश देकर आरर है. उनका कोई अर्थ नहीं है क्योंकि सब मामलों में तो मूल क़ानून का ही सम्मान करना है!

 

सभी एक से हैं..

अरुण कान्त शुक्ला                                                        27/1/15

 

महिला सशक्तिकरण, शुरुवात परिवार से हो-

आज से 104 वर्ष पहले जब क्लारा जेटकिन ने महिला दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाने का आव्हान किया था तो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कुछ ही दशकों में पूंजीवादी बाजार इस दिन पर भी अपना कब्जा कर लेगा और दुनिया की तमाम देशों की सरकारें और बाजार की निहित स्वार्थी ताकतें इसका प्रयोग न केवल प्रतीकात्मक बनाकर रख देंगी बल्कि योजनाबद्ध और संस्थागत तरीके से इसका उपयोग महिलाओं के उपर होने वाले शोषण, अपराधों, भेदभाव तथा असमानता की तरफ से ध्यान हटाने के लिए किया जाने लगेगा|

इस सचाई के बावजूद कि पिछले दस दशकों के दौरान विश्व में हुई आर्थिक प्रगति ने विश्व समाजों के प्रत्येक तबके पर कुछ न कुछ धनात्मक प्रभाव अवश्य ही डाला है, जो सोच और विचार के स्तर पर भी समाज में परिलक्षित होता है, स्त्रियों के मामले में यह एकदम उलटा दिखाई पड़ता है| पिछले 100 वर्षों के दौरान हुए तकनीकि और औद्योगिक परिवर्तनों और पैदा हुई आर्थिक संपन्नता ने मनुष्यों के रहन-सहन, खान-पान और सोच-विचार सभी को उदार बनाया| नस्ल, जाति, धर्म के मामलों में यह उदारवादी दृष्टिकोण काफी हद तक दिखाई पड़ता है| पर, स्त्रियों के मामले में आज भी मनुष्यों की वही सामंतवादी पुरातनपंथी सोच है, जिसके चलते स्त्री उसके सम्मुख प्रतीकात्मक रूप से तो देवी है, पर व्यवहार में उससे कमतर और भोग्या है|

यदि कोई परिवर्तन हुआ है तो वह यह की बाजार के रूप में एक नया स्त्री शोषक खड़ा हो गया है, जिसके शोषण का तरीका इतना मोहक और धीमा है कि स्वयं स्त्रियों को यह जंजाल नहीं लगता है| यही कारण है कि 104 साल पहले समानता, समान-वेतन, कार्यस्थल पर उचित कार्य-दशाएं जैसे जिन मुद्दों को लेकर महिलाओं की गोलबंदी शुरू हुई थी, वे तो दशकों बाद आज भी जस की तस मौजूद हैं ही, साथ ही साथ स्त्रियों को स्वयं को एक उत्पाद के रूप में इस्तेमाल होने से बचने की नई लड़ाई भी लड़नी पड़ रही है|

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर आज सबसे अधिक जोर महिलाओं के सशक्तिकरण पर है| यहाँ तक कि विश्व बैंक जैसी संस्था भी महिला सशक्तिकरण से सबंधित योजनाओं के लिए विशेष फंडिंग करती है| पर, चाहे वह दुनिया के देशों की सरकारें हों या अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं सबकी महिलाओं के लिए उपज रही सहृदयता, सद्भावना और सहायता का कारण वह बाजार है, जो दुनिया की आधी आबादी के साथ जुड़ा है| यही कारण है कि महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों का पूरा फोकस महिला श्रम के दोहन के लिए बनाए जा रहे आर्थिक कार्यक्रमों पर ही है और महिलाओं की सामाजिक, लेंगिक, राजनीतिक और  धार्मिक रूप से शोषण करने वाली समस्याओं को कभी वरीयता नहीं दी जाती|

भारत जैसे विडंबनाओं वाले देश में जहां पुरातनपंथी ढंग से महिलाओं को देवी बनाकर पूजनीय तो बताया जाता है, पर व्यवहार में इसके ठीक उलट होता है, महिला सशक्तिकरण की स्थिति दयनीय ही हो सकती है| वर्ष 2003 में जारी वर्ल्ड इकानामिक फ़ोरम की ग्लोबल जेंडर गेप रिपोर्ट में भारत का स्थान 136 देशों में 101वां था| उसके पहले इंटरनेश्नल कंसल्टिंग एंड मेनेजमेंट फर्म बूज एंड कंपनी ने वेतन समानता, कार्यनीति, संस्थागत समर्थन और महिलाओं में हुई प्रगति के आधार पर 128 देशों में सर्वेक्षण किया था, जिसमें भारत का स्थान 115वां था| इसका सीधा अर्थ हुआ कि भारत में सरकारी स्तर पर नीतियाँ बनाते समय केंद्र और राज्यों की सरकारों ने महिला सशक्तिकरण के दावे चाहे जितने किये हों, पर वास्तविकता में न तो उतने कदम उठाये गए और न ही बनाई गयी योजनाओं का अमलीकरण धरातल पर ठोस रूप ले पाया| देश के निजी कारपोरेट सेक्टर भी कभी महिला सशक्तिकरण के लिए इच्हुक नहीं दिखा है|

जब महिलाओं के लिए समानता की बात की जाती है और विशेषकर ट्रेड यूनियनों में, कामगार महिलाओं के अन्दर, तो अधिकांश बहस और जोर वेतन में भेदभाव और कार्यस्थल पर महिलाओं की कार्य करने की दशाओं के खराब होने, लैंगिक भेदभाव तथा यौन प्रताड़नाओं तक और वह भी संगठित क्षेत्र की कामगार महिलाओं के विषय में सीमित होकर रह जाता है| इसमें कोई दो मत नहीं कि उपरोक्त सभी मुद्दे संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों की कामगार महिलाओं से सबंधित महत्वपूर्ण मुद्दे हैं और इनकी किसी भी कीमत पर उपेक्षा नहीं की जा सकती है| पर, वेतन में भेदभाव से लेकर यौन प्रताड़ना तक की उपरोक्त सभी व्याधियां कार्यस्थल की उपज नहीं हैं| पुरुष और महिला दोनों कामगार इन सारी व्याधियों को समाज से ही लेकर कार्यस्थल पर पहुँचते हैं| इसलिए इन सारी व्याधियों को कार्यस्थल से ही संबद्ध कर देखना, आज तक किसी निदान पर नहीं पहुँचा पाया है| महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने के लिए बने कानूनों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के बावजूद यदि कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ भेदभाव और लैंगिक शोषण में कमी नहीं आ रही है तो इसके पीछे वही माईंडसेट है, जिसे समाज से लेकर कामगार कार्यस्थल पर पहुँचते हैं| सर्वोच्च न्यायालय के जज से लेकर तेजपाल और राजनीतिज्ञों से लेकर आशाराम तक के सभी सेक्स स्कंडलों में यही माईंडसेट कार्य कर रहा है| भारत की कट्टरपंथी ताकतें इसका निदान महिलाओं को घर-गृहस्थी तक ही सीमित रहने की सलाह देने में देखती हैं| सुनने में यह सलाह कितनी भी आकर्षक क्यों न लगे, पर, बाजार के निरंतर बढ़ते शोषण और दबाव और कट्टरपंथी ताकतों की सलाह के बीच बहुत बड़ा विरोधाभास है, जो महिलाओं को अपना श्रम बेचने के लिए घर से बाहर निकलने को लगातार मजबूर करता रहता है और ऐसी कोई भी सलाह सिर्फ व्यर्थ का प्रलाप साबित होती रहती है| दुर्भाग्यजनक यह है कि सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं देने की प्रवृति हाल के दशकों में बढ़ी है| एक बच्ची के जन्म के साथ शुरू होने वाला यह भेदभाव उसकी शिक्षा, रोजगार, वेतन, सामाजिक और आर्थिक जीवन से लेकर उसके बारे में राजनीतिक सोच तक लगातार कुत्सित तरीके से मजबूत हो रहा है|

आज जब मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, मेरे सामने छत्तीसगढ़ की नई राजधानी के उपरवारा गाँव की दुलारी बाई की ह्त्या का समाचार है| उसकी हत्या उसके सगे भतीजे ने ही टोनही होने के आरोप में कर डाली| दुलारी बाई के तीनों बेटे और बेटी ह्त्या के समय घर में ही थे| ये सभी घटना के बाद घर से बाहर आये| लगभग 20 दिनों पूर्व छत्तीसगढ़ के ही कोरबा जिले के विकासखंड पोड़ी उपरोड़ा के घुमनीडांड गाँव में बेटे ने ही 65 वर्षीय माँ को चुड़ैल मानकर उसके बाल काटे और उसके साथ बैगा के चक्कर में आकर मार-पीट की| सम्मान के नाम पर हर साल एक हजार से ज्यादा महिलाओं को मार दिया जाता है| 2013 में नॅशनल क्राईम रिकार्ड के द्वारा जारी की गयी रिपोर्ट के अनुसार पिछले चार दशकों में बलात्कार के मामले में 900 फीसदी बढे हैं| 2010 में तकरीबन 600 मामले प्रतिदिन महिलाओं के खिलाफ अपराधों के दर्ज हुए| महिलाओं के प्रति सोच का यह रवैय्या समाज से लेकर शासन तक सभी स्तरों पर मौजूद है| यदि, यही सोच एक लडकी को शिक्षा से वंचित रखती है तो यही सोच विधायिका में महिलाओं के लिए आरक्षण का बिल लोकसभा में पास नहीं होने देती है| यही सोच सरकार को आरक्षण के सवाल पर गंभीरता से प्रयास करने से रोकती भी है|

जब तक समाज में स्त्रियों को पुरुषों से दोयम समझने की यह सोच मौजूद रहेगी, महिला सशक्तिकरण शासन से समाज तक ज़ुबानी जमा-खर्च ही बना रहेगा| परिवार, समाज और देश तीनों को सशक्त बनाने का काम घर-परिवार में महिलाओं को सशक्त बनाये बिना नहीं हो सकता है, इस शिक्षा को देने और फैलाने का काम समाज की प्राथमिक इकाई परिवार से ही शुरू करना होगा ताकि स्त्रियों के प्रति हीन सोच उद्गम स्थल से ही बदल सके| क्योंकि, स्वतंत्रता पश्चात के इतने वर्षों में ऐसी सदिच्छा सरकार, प्रशासन, राजनीति और धर्म तथा संस्कृति के प्रमुखों, किसी ने भी नहीं दिखाई| वे ऐसा करेंगे भी नहीं, क्योंकि आधे समाज का दूसरे आधे हिस्से के प्रति बैरभाव और शोषणकारी रवैय्या, उन्हें उनकी व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होता है| आने वाले समय में विश्व की कामगार दुनिया में एक अरब स्त्रियाँ प्रवेश करने वाली हैं| भारत जनसंख्या के आधार पर विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है| पर, इसकी कामगार दुनिया में उस एक अरब महिलाओं का बहुत कम हिस्सा शामिल होगा| कारण, स्त्रियों के प्रति सोचने का भारतीय समाज का दकियानूसी ढंग, जिसे बदले बिना न महिला सशक्तिकरण पूरा होगा और न देश सशक्त होगा|

अरुण कान्त शुक्ला

      

                                           

सवाल गुणवत्तापूर्ण शिक्षण का है –

सवाल गुणवत्तापूर्ण शिक्षण का है –

 यदि हंगामों के बीच से कोई अच्छी चीज निकल कर सामने आती है तो हंगामें अच्छे हैं | पर , हमारे देश की संसद में होने वाले हंगामों से किसी अच्छी चीज के निकल आने की उम्मीद रखना बेकार है | नेहरू-आंबेडकर कार्टून पर हुए हंगामें से भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण और देश के नौनिहालों के लिए सौभाग्यशाली बात निकलकर सामने आ सकती थी और वह थी सबसे ज्यादा उपेक्षित शिक्षा और शिक्षण पद्धति पर एक सार्थक बहस और उसका एक सार्थक परिणाम | पर , ऐसा होना तो कभी का बंद हो चुका है , इसलिए ऐसा नहीं हुआ और जितनी कम बुद्धि और सोच-विचार के बाद राष्ट्रीय शिक्षण अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने पाठ्यक्रमों में सीखने की प्रक्रिया को खुशनुमा और रोचक बनाने के लिए कार्टूनों का प्रयोग शुरू किया था , उससे भी कम बुद्धि खर्च किये बिना संसद के दोनों सदनों में हुए हंगामें के बाद निर्णय ले लिया गया कि आगामी सत्र से नेहरु-अंबेडकर ही नहीं सारे कार्टून वापस ले लिए जायेंगे | इस पूरे एपीसोड में तीन अहं कमियां उजागर हुई हैं , जो बताती हैं कि देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है , जब हमारे पास न केवल देश के आमजनों तथा देश के बच्चों की सोच को सामने रखकर नीतियों और व्यवस्था बनाने वाली बौद्धिक क्षमता का नितांत अभाव है बल्कि देश का जो भी बौद्धिक हिस्सा है , फिर चाहे वो राजनीति में हो , समाजसेवा में हो , शिक्षण व्यवस्था में हो या सरकार में हो , उसने सिर्फ अपने और नितांत अपने स्वार्थों के अनुसार ही अपनी सोच और आचरण को ढाल लिया है |

 पहली कमी यह कि संसद के दोनों सदनों और संसद के बाहर हुए हंगामों में सिर्फ या तो अंबेडकर के अपमान का सवाल उठा या फिर नेहरू के | कहीं भी और किसी ने भी ये मूल सवाल नहीं उठाया कि क्या शिक्षण व्यवस्था में और वह भी कक्षा नौ से लेकर बारहवीं तक के विद्यार्थियों को किसी भी विषय को पढ़ाने के लिए इस तरह के व्यंगात्मक कार्टूनों की आवश्यकता है क्या ? शिक्षण को थोड़ा मनोरंजक और खुशनुमा बनाने के लिए चित्रों का प्रयोग हमेशा होता रहा है | विशेषकर , प्राथमिक शिक्षण में याने नर्सरी से लेकर पांचवीं कक्षा तक की पुस्तकों में | कार्टूनों का प्रयोग बहुत पुराना नहीं है और एनसीईआरटी के गठन के समान ही कार्टूनों के प्रयोग का आईडिया भी पश्चिम से आयातित है | पर , वहाँ भी शैक्षणिक कार्टून बिलकुल अलग होते हैं और निचली कक्षाओं में प्रयुक्त अधिकतर कार्टून शिक्षण पद्धति पर ही होते हैं | राजनीतिक प्रयोग से बचा जाता है | योगेंद्र यादव , जो एन सी ई आर टी के सलाहकार हैं ,  ने जिस तरह एनडीटीवी पर त्वरित प्रतिक्रया देते हुए कहा कि कार्टूनों पर बेन लगाने के लिए एक क़ानून पास कर देना चाहिये , वह अहं से आहत शिक्षाविद की प्रतिक्रिया है | साधारणजन भी जानते हैं कि व्यंग कार्टून या तो किसी विचारधारा या स्वयं की समझ पर आधारित होते हैं | व्यस्क हो सकता है कि इन्हें मुस्कराकर निकाल दें , पर बच्चों के मामले में सावधानी की जरुरत है | पाठ्यक्रम की विषय वस्तु कुछ भी हो , पर जिस तरह के कार्टून अवयस्क विद्यार्थियों याने बारहवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया , वे विषय की निरपेक्ष शिक्षा देने के बजाय , अपने अतीत को व्यंगात्मक तरीके से देखने की शिक्षा ज्यादा देने का काम करेंगे , इसमें कोई संदेह की गुंजाईश नहीं है और यह देश के लिए भी उचित नहीं है |

दूसरी अहं कमी है एनसीईआरटी जैसी शिक्षण संस्थान का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया जाना | 1961 में इसकी स्थापना तकनीकि , कला और विज्ञान के क्षेत्रों में शोध और प्रशिक्षण प्राप्त बौद्धिक समूह को पैदा करने और पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था में शालेय शिक्षा के संबंध में केन्द्र और राज्य सरकारों को उस शोध और प्रशिक्षण के आधार पर उचित सलाह और मार्गदर्शन देने के उद्देश्यों से की गयी थी | चूंकि एनसीईआरटी के द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का प्रयोग पूरे देश के उन सभी सरकारी और निजी स्कूलों में होता है जहां सीबीएसई (Central Board Of Secondary Education) का पाठ्यक्रम लागू है , सत्तारूढ़ दल इसका राजनीतिक प्रयोग करने में कभी नहीं हिचके और इसकी स्वायत्तता शनैः शनैः खत्म करते गये | इसकी शुरुवात मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व काल में हुई जब स्वयं मोरारजी देसाई ने यह कहते हुए कि शैक्षणिक जगहों पर कम्युनिस्टों ने घुसपैठ कर रखी है और वे अपने विचारों को शिक्षा में घुसाते जा रहे हैं , एनसीईआरटी के पाठ्यक्रमों के साथ छेड़छाड़ करते हुए आर.एस.शर्मा की पुस्तक आदिकालीन भारत (Ancient India) को पाठ्यक्रम से हटवा दिया | पहले 1977 से 1979 के मध्य और उसके बाद एनडीए सरकार के दौरान “राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा” बनाने के नाम पर एनसीईआरटी के पूर्ण हिंदुत्वीकरण के भरपूर प्रयास हुए | शिक्षा को निरपेक्ष रखने के सवाल पर इन प्रयासों का विरोध होने पर भाजपा ने हवाला दिया कि वह एनसीईआरटी जैसे संस्थान को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और कम्युनिस्टों के प्रभाव वाली शिक्षण व्यवस्था से बाहर लाकर उसमें आये ठहराव को समाप्त करना चाहती है | 2004 में यूपीए की सरकार के आने के बाद एनसीईआरटी की पुस्तकों में फिर बदलाव शुरू हुआ और शिक्षा के निरपेक्ष चरित्र को पुनः बहाल करने की कोशिशें हुई | 1977 वह समय था , जब भारत में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी और इस राजनीतिक परिवर्तन ने एनसीईआरटी से जुड़ी पूरी बौद्धिक जमात की सोच को बदल दिया और यह कहना गैर जायज नहीं होगा कि उसके बाद शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों की एक ऐसी जमात तैयार हो गयी , जिसका पूरा उद्देश्य यह हो गया कि पाठ्यक्रम में ऐसी विषय वस्तु शामिल करो , जो सत्तारूढ़ राजनीतिज्ञों को सूट करती हो | सत्तारूढ़ पार्टी के बारे में कुछ अच्छा कहो और उससे आपको सरकार का फेवर भी मिलेगा | इतिहास के उन बिंदुओं पर बल दो जो सत्तारूढ़ पार्टी को शक्ति और शान देते हों और सरकार की मेहरबानियों के हकदार बनो | आज हम जिस रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार की बात करते हैं , ये उससे भी पहले शुरू हुआ और उससे ज्यादा भयानक और खतरनाक है | कितनी दुखदायी बात है कि संसद में पहली बैठक की साठवीं वर्षगांठ के ठीक पहले हंगामा हुआ लेकिन देश के नौनिहालों की शिक्षा से खिलवाड़ और उन्हें भटकाने के इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर कोई सार्थक बात नहीं हुई |

तीसरी अहं कमी यह उजागर हुई कि पूरे मामले को शिक्षा से अलग थलग करके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल से जोड़ दिया गया | एक ऐसी व्यवस्था में जैसी में हम रह रहे हैं , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के उदाहरण सैकड़ों की संख्या में पूरे देश में बिखरे पड़े हैं | अभिव्यक्ति तो दूर की बात है , समाचार प्रेषण तक इससे बचा नहीं है और देश में इस सवाल पर कभी खामोशी भी नहीं रही और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हुए प्रत्येक हमले का विरोध माकूल तरीके से मीडिया और बुद्धिजीवियों सहित आमजनों तक ने किया है | पर , वर्त्तमान मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ अपनी शातिर सोच पर चादर डालने की कोशिश भर है | पाठ्यपुस्तक में शामिल वह कार्टून छात्रों की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि उन्हें पढाने के लिए था , अतएव उनकी किसी स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं हुआ है | बरसों पूर्व ये कार्टून शंकर्स वीकली में छपा था और नेहरू और अम्बेडकर दोनों ने इस पर कोई आपत्ति या रोक नहीं लगाई थी | इसलिए दशकों बाद अब उस पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन का आरोप लगाना भी गलत है | यह सच है कि पिछले कुछ दशकों में समाज के अंदर नियोजित तरीके से असहिष्णुता बढाने की कोशिशें हो रहीं हैं और उसके खिलाफ वातावरण बनाना और उसका विरोध करना बहुत अधिक आवश्यक है , जैसा कि योगेन्द्र यादव ने अपने बाद में लिखे लेख में कहा भी है | पर , उससे भी ज्यादा जरूरी है कि हमारे नौनिहालों को पूर्वाग्रहित होने से बचाया जाना है | जैसा नहीं होने का नतीजा हम समाज में बढ़ती असहिष्णुता के रूप में देख रहे हैं , जो आजकल सोशल साईट्स पर भी बिखरा पड़ा है | क्या इस तरह के कार्टूनों को कोर्स में शामिल करके उस असहिष्णुता को रोका जा सकता है ?

यह अत्यंत दुःख का विषय है कि इस विवाद के सतह पर आने के चलते योगेन्द्र यादव और सुहास पलशिकर जैसे विद्वजनों को एनसीईआरटी के मुख्य सलाहकार के पदों से इस्तीफा देना पड़ा | उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यजनक सुहास पलशिकर पर पुणे में किया गया हमला है , जो हर दृष्टिकोण से निंदनीय है | पर , उससे भी ज्यादा दुखद यह है कि न तो हमारे सांसदों ने दोनों सदनों में और न ही मीडिया या देश के बुद्धिजीवियों या शिक्षाविदों ने और यहाँ तक कि स्वयं योगेन्द्र यादव ने इस पूरे घटनाक्रम का उपयोग देश की गुणवत्ताहीन शिक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करने में नहीं किया | आज जब आर्थिक मोर्चे पर भारत के बुलंद होने की बातें की जाती हैं और भारत को एक उभरती हुई आर्थिक ताकत के रूप में पेश किया जाता है , तब क्या यह सोचनीय नहीं है कि दुनिया की सात उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में भारत का स्थान छटवां है , वह भी स्कूली शिक्षा में , जहां कार्टूनों से पढ़ाने को आधुनिकता का नाम दिया जा रहा है | ज्यादा पीछे की बात नहीं है , मात्र तीन वर्ष पूर्व एसोचेम ने अपने एक सर्वे “कम्परेटिव स्टडी आफ इमर्जिंग इकानामीज ऑन क्वालिटी आफ एडुकेशन” में भारत को चेताया था कि यदि भारत में शिक्षा की गुणवत्ता और व्यवस्था की तरफ गंभीर ध्यान नहीं दिया गया तो भारत आने वाले समय में अन्य देशों के मुकाबले प्रतियोगिता में पिछड़ जाएगा | अंत में , मैं अपनी बात और शिक्षा में गुणवत्ता की बात , तीन वर्षीय बच्चे को नर्सरी में पढ़ाई जाने वाली कविता से उपजे सवाल से खत्म करूँगा | कविता ऐसी है ;

 दूर हवा में लटका है , जैसे उल्टा मटका है

घूम रहा है आवारा , रंग बिरंगा गुब्बारा

इस देश के शिक्षाविदों , बुद्धिजीवियों , राजनीतिज्ञों , शिक्षण संस्थाओं , बताओ , मैं अपनी तीन वर्षीय पोती को आवारा शब्द का मतलब कैसे और क्या समझाऊँ ?

अरुण कान्त शुक्ला         

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के पीछे का सच –

  प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के पीछे का सच –

 

यह संयोग तो कदापि नहीं है कि यूरोप के आर्थिक संकट से थर्राये भारतीय उद्योगपति जब विश्व आर्थिक फोरम के अंतर्गत आयोजित भारत आर्थिक सम्मेलन में सरकार से ताबड़तोड़ नीतिगत कदम उठाने और विदेश में छाई आर्थिक सुस्ती से भारत में पूंजी प्रवाह कम न होने देने की मांग कर रहे थे , तब , कोलकाता में उद्योग चेंबर एसोचेम के सदस्यों को वित्तमंत्री दिलासा दे रहे थे कि वैश्विक आर्थिक संकट का भारत पर असर तो हुआ है लेकिन इससे घबराने की जरुरत नहीं है और इससे निपटने के लिये सरकार कठोर कदम उठाने से नहीं हिचकेगी | एक सप्ताह के भीतर ही केन्द्र सरकार ने पेंशन सेक्टर में 26% तथा मल्टीब्रांड रिटेल में 51% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति देने के साथ सिंगल ब्रांड में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 51% से बढ़ाकर 100% करके बता दिया कि भारत के सबसे बड़े टेक्नोक्रेट , हमारे प्रधानमंत्री के अंदर बसी एडम स्मिथ की आत्मा भले ही लोगों को सुप्त लग रही हो , पर , वो अभी भी पूरी तरह जागृत है |

 

दरअसल , आज जब भारत सरकार या हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह , उदारीकरण का नया दौर लागू करने जा रहे हैं , तब , हमारे देश की अर्थव्यवस्था लगभग उसी दशा से गुजर रही है , जैसी कि वो 1991 में थी , जब मनमोहनसिंह के वित्तमंत्री रहते हुए भारत में उदारीकरण के सुधारों को प्रारंभ किया गया था | जो 1991 के दौर से गुजरे हैं , वो जानते हैं कि अर्थव्यवस्था आज भी उतनी ही अनिश्चितता और अस्थिरता से गुजर रही है , जैसी कि वो 1991 में थी | भारतीय मुद्रा का मूल्य डालर के मुकाबले लगातार गिरता जा रहा है | विदेशी मुद्रा का प्रवाह ही नहीं रुका है , घरेलु बाजार से लगभग सवा खरब रुपये की विदेशी मुद्रा पिछले कुछ समय में पलायन कर चुकी है | बजट घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है | व्यापार घाटा सुरसा के मुहँ के समान फैलता जा रहा है | मनमोहनसिंह हर आलोचना के जबाब में जिस विकास दर का दंभ  भरा करते थे , वह इस वर्ष 7.5% भी रहे तो गनीमत है | कुल मिलाकर अर्थशास्त्र का साधारण जानकार भी कह सकता है कि जो कुछ भी हो रहा है , वह निराशाजनक है | भारतीय अर्थव्यवस्था आज जिस दौर से गुजर रही है , वह समय मांग कर रहा है कि उदारीकरण के दो दशकों की समीक्षा कर सतर्कता के साथ फैसले लिये जायें | पर , मनमोहन सरकार ऐसा करने के बजाये , एक बार फिर से देशवासियों को अमृत बताकर उदारीकरण का विष पीने को कह रही है |

 

एक पुरानी कहावत है कि जब सब कुछ निराशाजनक हो तो दुस्साहसी बनना चाहिये और 1991 के बाद भारत सरकार एक बार पुनः दुस्साहसी बन रही है | पिछले एक सप्ताह के दौरान विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को लुभाने के लिये केन्द्र सरकार के द्वारा उठाये गये कदम उसी दुस्साहस का प्रतीक हैं | दर्दनाक यह है कि भारत सरकार का यह दुस्साहस भारत के मजदूरों , किसानों और वंचित तबके के प्रति अपनी प्राथमिक सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिये न होकर , देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 30 करोड़ देशवासियों , देश के कुल बच्चों में से 40% कुपोषित बच्चों की छाती पर  पाँव रखकर , भारत के उद्योग जगत और संपन्न तबके को खुश करने तथा अमेरिका और यूरोप के रईस देशों की मालदार कंपनियों को मंदी के दौर से निकालने के लिये है , जिसके लिये साम्राज्यवादी देशों के तरफ से पिछले लंबे समय से भारत के ऊपर दबाव बना हुआ था | कुछ समय पूर्व वाशिंगटन में हुई अमेरिका–भारत आर्थिक और वित्तीय सहयोग परिषद की बैठक में अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी टिमोथी गीथनर ने लगभग फटकार लगाते हुए कहा था कि अमेरिकन कंपनियां अभी भी भारत में बीमा , बैंकिंग , मल्टीब्रांड रिटेल और ढांचागत क्षेत्रों में रुकावटों का सामना कर रही हैं , जिसके फलस्वरूप दोनों देशों में रोजगार सृजन और आर्थिक विकास अवरुद्ध है | यदि भारत को मजबूत विकास दर की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करना है तो उसे पर्याप्त विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिये ठोस कदम उठाने के साथ घरेलु स्तर पर भी बाजार को निवेश मुहैय्या कराना होगा | यही तभी हो सकता है , जब भारत लंबित पड़े आर्थिक और वित्तीय सुधारों को तेजी से और तुरंत लागू करे | वह चाहे पीएफआरडीए जैसा घृणित क़ानून बनाकर लगभग 48 करोड़ कामगारों की गाढ़ी कमाई विदेशी और देशी पूंजी के हवाले करने का मामला हो या मल्टी रिटेल में 51% और सिंगल ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश की सीमा को 51% से बढ़ाकर 100% करके जमीन , फसल और उत्पादों को विदेशी प्रबंधन को सौंपने का मामला हो , सभी कदम अंतर्राष्ट्रीय और घरेलु बड़ी पूंजी के निर्देशों के अनुसार ही उठाये जा रहे हैं | इन कदमों का परिणाम , पीएफआरडीए के मामले में चाहे कितने ही दावे भारत सरकार और उसके पिठ्ठू अर्थशास्त्री क्यों न कर लें , कामगारों की जीवन भर की कमाई लुटेरों के हाथों में सौंपने के अलावा कुछ नहीं है | लोकसभा में पास होने के बाद पीएफआरडीए 2011 क़ानून बन जायेगा और भले ही किसी न्यायालय में इसे चुनौती न दी जा सके , लेकिन नैतिकता की अदालत में सरकार का यह काम हमेशा घृणित ही ठहराया जायेगा कि उसने देश के 48 करोड़ कामगारों को कान पकड़कर अपने जीवन भर की कमाई को जुएं में लगाने को मजबूर किया , क्योंकि वह कमाई उसके पास जमा करने के अलावा कोई दूसरा चारा उन कामगारों के पास नहीं था |

 

इसी तरह , भारत सरकार और वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा तीन वर्षों में एक करोड़ रोजगार पैदा होने , किसानों को वाजिब मूल्य प्राप्त होने और उपभोक्ताओं को वाजिब दामों पर सामग्री मिलने के कितने भी दावे क्यों न कर लें , वास्तविकता और अन्य देशों के अनुभव यही बताते हैं कि कि देश के छोटे किसान , छोटे फार्म्स और छोटी ओद्योगिक इकाइयां , विदेशी पूंजी के द्वारा संचालित संगठित रिटेल की जरूरतों की पूर्ति , बड़े घरेलु आपूर्तिकर्ताओं और विदेशी रिटेल आपूर्तिकर्ताओं की प्रतियोगिता के सामने नहीं कर पाएंगी और उन्हें या तो बिकना है या बर्बाद होना है | एक करोड़ रोजगार के अवसर भले ही पैदा हों , पर , वो होंगे खुदरा व्यापार में लगे पांच करोड़ से ज्यादा स्वरोजगारियों और रोजगार शुदा लोगों के रोजगार खोने की कीमत पर ही | इसमें कोई शक नहीं कि यदि मल्टीब्रांड में विदेशी निवेश आ जाता है तो कुछ समय के बाद बाजार विदेशी उत्पादों और वस्तुओं से भर जायेगा और देशी उत्पादकों को बर्बाद होना पड़ेगा | फार्मस , आपूर्ति श्रंखला और गोदाम क्षमता विकसित होने के बाद एकाधिकार बड़े नैगमों के पास ही होगा , उससे जमाखोरी और मुनाफाखोरी ही बढ़ेगी | ऐसी परिस्थिति में उपभोक्ताओं को कम दाम पर उत्पाद मिलने की बात एक मरीचिका पैदा करने के अलावा कुछ नहीं है |

 

एक ऐसे देश में जहां जनसंख्या का 70% हिस्सा आज भी गाँवों में रहता हो | जहां दुनिया के कुल  गरीबों का 40% हस्सा बसता हो | जहां के 78% लोग 20 रुपये से भी काम पर गुजारा करते हों , उस देश के 10 लाख से ज्यादा की आबादी वाले 54 शहरों में खुलने वाले सुपरबाजार राष्ट्र के किस हिस्से का हित ध्यान में रखेंगे , इसे आसानी से समझा जा सकता है |

अरुण कान्त शुक्ला